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बिना मान्यता के विद्यालय बच्चों के भविष्य के साथ कर रहे खिलवाड़

जौनपुर। शिक्षा के विस्तारीकरण के नाम पर पिछले कई शकों से सरकारी एवं गैर सरकारी मान्यताप्राप्त स्कूलों के साथ स्कूलों की बाढ़ आ गयी है। कोई पेड़ के नीचे, कोई छप्पर के नीचे, कोई किराये के कमरे में तो कोई अपने घर में ही स्कूल चला रहा है। जिस तरह झोला छाप डाक्टर फिजीशियन एण्ड सर्जन का बोर्ड लगाकर गली-गली दवाखाना चला रहे हैं, उसी तरह बिना मान्यता प्राप्त स्कूल भी गांव-गांव व गली-गली लम्बा-चौड़ा मान्यता प्राप्त का बोर्ड लगाकर स्कूल रूपी दुकान चला रहे हैं। इन बिना मान्यता प्राप्त स्कूलों के बच्चों की वजह से शैक्षणिक घोटाले होते हैं, क्योंकि इन बच्चों के नाम किसी न किसी सरकारी अथवा मान्यताप्राप्त स्कूलों में पंजीकृत कराये जाते हैं और वहीं से परीक्षा दिलवाकर सर्टिफिकेट भी दिलवाये जाते हैं। फर्जी दाखिले के नाम पर एक मोटी रकम वसूली जाती है और नकल की सुविधा उपलब्ध कराकर बढ़िया परीक्षाफल दिलवाया जाता है। इन नकली स्कूलों की वजह से असली स्कूलों का अस्तित्व खतरे में नहीं पड़ता जा रहा है, बल्कि शिक्षा के स्तर में गिरावट लायी जा रही है। शिक्षा के नाम दुकानें चलाकर शिक्षा को नीलाम करने का दौर शुरू हो गया है और इस कार्य में मान्यताप्राप्त व बिना मान्यता प्राप्त दोनों जुटे हैं। कुकुरमुत्तों की तरह गली-गली चलने वाले दुकाननुमा स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक स्वयं प्रायः जूनियर हाईस्कूल से लेकर इण्टर तक ही पढ़े होते हैं और उन्हें ढंग से पढ़ाने का तरीका कौन कहे, व्याकरण एवं शब्दों तक का ज्ञान नहीं होता है। गांवों, गलियों, कस्बों व बाजारों में बिना मान्यता स्कूलों के खुलने का एक सिलसिला लगातार चल रहा है। ऐसे कुछ स्कूल तो चलते हैं लेकिन कुछ दो-चार साल बाद बंद हो जाते हैं। इन बिना मान्यता प्राप्त स्कूलों में ऐसा कोई नहीं है जो चोरी से चलता हो, बल्कि सभी खुलेआम विभागीय शह पर चलते हैं। इन फर्जी स्कूलों को बंद कराने की मुहिम सरकार हर साल शिक्षा सत्र शुरू होने पर कम कागजों पर अधिक चलाती है और हर साल नोटिस देकर कागज पर इन अपंजीकृत स्कूलों को बंद करवा दिया जाता है। इस साल भी इन बिना मान्यता प्राप्त विद्यालयों को चिन्हित करके उन्हें सूचीबद्ध करके हमेशा की तरह बंद करने की नोटिस थमा दी गयी है। नोटिस देने के बाद अब इस समय शिक्षा विभाग, उपजिलाधिकारी, तहसीलदार या मजिस्ट्रेट व पुलिस की संयुक्त टीम इन विद्यालयों को बंद कराने औपचारिकता पूरी कर रही है। दरअसल स्कूल खोलना बुरी बात नहीं है। एक समय में स्कूल चलाने वाले का समाज में बहुत सम्मान किया जाता था, क्योंकि शिक्षा दान को सर्वोत्तम दान और शिक्षा देने वाले को दानवीर कहा जाता है। यह सही है कि सरकारी शिक्षा की चरमराती व्यवस्था में इन गैरसरकारी स्कूलों खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों का बहुत महत्व है। इन गैरसरकारी विद्यालयों से शिक्षा का स्तर एवं लोगों की अभिरूचि बढ़ी है। फलस्वरूप आज 90 फीसदी परिवारों के बच्चे इन गैरसरकारी स्कूलों में पढ़ने जा रहे हैं। अभिभावक से पढ़ाई से मतलब होती है। विद्यालय मान्यता प्राप्त है कि नही। इससे मतलब नहीं होता है। नियमानुसार रजिस्ट्रेशन कराने के बाद ही विद्यालय की शुरुआत की जा सकती है और उसके बाद अलग-अलग स्तर पर मान्यता लेनी पड़ती है। जूनियर हाईस्कूल की मान्यता लेकर हाईस्कूल या इण्टर कक्षाएं चलाना गलत है लेकिन अभिभावक इसे बुरा नहीं मानता है, क्योंकि उससे पढ़ाई और परीक्षा परिणाम से मतलब होता है।

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