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सचिव एकता कुशवाहा ने लोक अदालत व योजनाओं की दी जानकारी

जौनपुर। एकता कुशवाहा सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने बताया कि राज्य प्राधिकरण लखनऊ के निर्देशानुसार व ओपी त्रिपाठी जनपद न्यायाधीश/अध्यक्ष के निर्देशन एवं ंजिला प्राधिकरण के बैनर तले शनिवार को लोक अदालत तथा नालसा द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं सम्बन्धी‘ विषय पर लोगों को जानकारी प्रदान करने हेतु सदर तहसील में विधिक साक्षरता शिविर का आयोजन हुआ। एकता कुशवाहा की अध्यक्षता में आयोजित शिविर में तहसीलदार ज्ञानेन्द्र सिंह, नायब तहसीलदार मान्धाता प्रताप सिंह, राजस्व निरीक्षक अखिलेश पाठक, लेखपाल अजय सेठ, पैनल अधिवक्ता देवेन्द्र यादव सहित तमाम लोग उपस्थित रहे। इस दौरान सचिव एकता ने बताया कि बताया कि 9 नवम्बर को राष्ट्रीय कानूनी सेवा दिवस मनाया जाता है जिसका उद्देश्य वैकल्पिक विवाद समाधान यांत्रिकी के माध्यम से विवादों के निपटाने को बढ़ावा देना व अदालतों पर मुकदमेबाजी के बोझ को कम करना है। पूर्व में भी व्यक्तियों के बीच विवाद को पंचनामा के लोगों के समूह द्वारा सुन व समझकर हल किया जाता रहा है। अब इसे लोक अदालत के रूप में वर्ष 1987 से वैधानिक स्वीकृति प्राप्त है। लोक अदालत में मोटर दुर्घटनाओं में मुआवजे के लिये दावों से सम्बन्धित, भूमि अधिग्रहण मुआवजे सम्बन्धित, दीवानी प्रकृति, आपराधिक प्रकृति के शमनीय, पारिवारिक/वैवाहिक विवाद सम्बन्धित, लघु प्रकृति के मामले संदर्भित हो सकते हैं। लोक अदालत पारम्परिक एडीआर के तीनों रूपों (मध्यस्थता, मध्यस्थता और सुलह) का मिश्रण है। सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 89 मुकदमे को सुलह-समझौता से निपटारों का उपबन्ध करती है जिसमें लोक अदालत के माध्यम से समझौता सहित अन्य के माध्यम से समझौता कराया जाना शामिल है। सुलहकर्ता पक्षकारों को विवाद के पारस्परिक रूप से संतोषजनक सहमति तक पहुंचने में सहायता करते हैं। विवादों का समाधान आम तौर पर निजी तौर पर होता है। पक्षकारों की गोपनीयता बनी रहती है तथा समय व धन की बचत होती है। लोक अदालत या लोगों की अदालत में न्यायिक अधिकारी की उपस्थिति में बातचीत की सुविधा होती है। इसका आदेश अंतिम व पक्षकारांे पर बाध्यकारी होता है। इसमें विवादों का निस्तारण पक्षकारों की सहमति से होता हैं। इसका आदेश/निर्णय अपीलीय नहीं होता है। लोक अदालत की मुख्य विशेषता इसका किफायती होना है। इसमें कोर्ट फीस का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है। इसमें पक्षकारों को अधिवक्ता नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं होती है। लोक अदालत द्वारा पारित आदेश/निर्णय को अन्य निर्णय के समान अदालत द्वारा निष्पादित कराया जा सकता हैं। समझौता से संतुष्ट होने पर ही समझौता कराया जाता है। सचिव द्वारा नालसा द्वारा आयोजित विभिन्न योजनाओं के विषय से सम्बन्धित जानकारी दी गयी। तहसीलदार सदर ज्ञानेन्द्र सिंह ने छोटे-छोटे वादों को मध्यस्थता केन्द्र एवं लोक अदालतों के माध्यम से निस्तारण कराये जाने हेतु प्रोत्साहित किया। इसी क्रम में सचिव ने जिला कारागार का निरीक्षण करते हुये विधिक साक्षरता शिविर का आयोजन किया जहां जेल अधीक्षक एके मिश्र, जेलर राम प्रताप प्रजापति, जेल विजिटर अमित त्रिपाठी, अम्बरीष श्रीवास्तव, श्रीमती मीरा सिंह, जेल बन्दी आदि उपस्थित रहे। इस दौरान सचिव ने बन्दियों को संवैधानिक अधिकारों एवं संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों की जानकारी प्रदान कराते हुये किसी भी प्रकार की विधिक सहायता की आवश्यकता होने पर पत्र प्रेषित किये जाने हेतु निर्देशित किया गया।

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