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क्या नियम कानून सिर्फ आम आदमी के लिए

फाइल फोटो
(नौशाद मंसूरी)
जौनपुर (उत्तर प्रदेश) आज के इस परिवेश में जहां पूरा विश्व आम आदमी और उसके मौलिक अधिकारों की बात करता है, समानता की बात करता है, अधिकारों की बात करता है क्या वास्तव में सच्चाई के धरातल पर ऐसा होता है।ये एक बड़ा सवाल है दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र की बात करें तो क्या भारत मे समानता, मौलिक अधिकार, भेदभाव, वीआपी कल्चर आदि जमीनी हकीकत है या फिर ये सब बातें कहने और सुनने के लिए होती है।

अगर वास्तव में धरातल पर देखा जाय तो बहुत बड़ा अंतर नज़र आता है।
जैसे समाज दो हिस्से में बटा है अमीर गरीब, अगड़ा पिछड़ा, और रसूखदार एवं आम आदमी ये खाई न जाने कितने वर्षों से पाटी जा रही है मगर खाई इतनी गहरी है की पटने का नाम ही नही लेती है।
अगर बात छोटे स्तर से करे तो देखने मे आता है अगर किसी नगर या शहर का कोई रसूखदार या पैसे वाला कोई अपराध करता है तो पुलिस से लेकर समाज के तथाकथित ठेकेदार पैसे वाले के समर्थन में थाने केबअंदर  से लेकर बाहर तक इतनी पैरवी होने लगती है और पुलिस का उस अपराधी पर ऐसा व्यवहार रहता है की जैसे वह कोई अपराधी न होकर थाने का कोई मेहमान हो ऐसे लोगो के समर्थन में समाज के कुछ ठेकेदार और पुलिस भी पीड़ित पक्ष को ऐसा समझाने का भरसक प्रयास करते है की जैसे उसने कोई अपराध ही न किया हो गम्भीर गम्भीर अपराधों को भी महज एक छोटी सी गलती साबित करने का प्रयास किया जाता है और समाज मे मान मर्यादा, इज़्ज़त, रुसवाई आदि की दुहाई देकर इतना प्रेसर बना दिया जाता है खुद पीड़ित अपने कदम पीछे खींचने को विवश हो जाता है।
और समाज के ऐसे सफेदपोश अपराधियों के पास पैसे का पेड़ तो होता ही है जिसका वह भरपूर इस्तेमाल कर बड़े बड़े अपराध करने के बाद भी बेदाग होकर समाज मे फिर आजाता है।यही हाल बड़े स्तर पर भी होता है।स्वरूप भले परिवर्तित हो जाये मकसद और लक्ष्य दोनों स्थितियों में एक ही होता है अपने आप को अपराध करने के बाद भी धन बल के बदौलत बेदाग होना।
मगर दूसरा पहलू बहुत विचलित करने वाला होता है जो समाज के आम आदमियों के साथ घटित होता है वो आम आदमी जिसे राजनीति से कोई लेना देना नही सरकार से कोई लेना देना नही, शासन प्रशासन से कोई लेना देना नही।
जिसे रोज कुआं खोदना  और रोज़ पानी पीना है वो आम आदमी जो अगर एक दिन काम न करे तो उसके घर मे फाकाकशी की नौबत आजाये।
ऐसे लोगों को साथ बेकसूर होते हुए भी अगर कानून के जाल में फस गया या किसी किसी सरकारी काम मे उलझ गया तो वही समाज के तथाकथित ठेकेदार या अन्य कोई क्यो नही खड़ा होता है।आज भी भारत के कई जेलों में हजारों बेगुनाह बन्द है जो पैसे के अभाव में उस कैद से बाहर नही निकल पा रहे क्योकि ये वही आम आदमी है इस लिए सारे ठेकेदार गायब हो जाते है हां कुछ मामलों में अगर ज़रा सी भी राजनीति की गुंजाइश है तो नेताओ की दखलंदाजी जरूर बढ़ जाएगी मगर गौर करने वाली बात ये है पीड़ित को न्याय दिलाना मकसद नही रहेगा मकसद राजनीति की रोटी सेंकना होगा ।
एक आम आदमी को किसी भी सरकारी काम करवाने के न जाने कितने चक्कर लगाने पड़ते है की जूते तक घिस जाए नाकों चने तक चबाना पड़ जाता है।
यही वो खाई है जो वर्षो से आज तक नही पाटी जा सकी ।
क्या नियम कानून सिर्फ आम आदमियों के लिए रसूखदारों के लिए महज एक दिखावा अगर ऐसा है तो कानून अंधा नही हो सकता वह सबकुछ देख सकता है, समझ सकता है, और सुन सकता है।

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